पटना – बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सियासी पारा चढ़ गया है। चुनावी माहौल में पुराने जुमलों की गूंज एक बार फिर से तेज हो गई है। राजद नेता रंजीत यादव की मौजूदगी में लगे “भूरा बाल साफ करो” नारे ने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। इस विवादास्पद नारे को समाज के विशिष्ट वर्गों — भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ (लाला) — के खिलाफ माना जा रहा है, जिससे अब विपक्ष हमलावर हो गया है।
🔴 BJP का प्रहार: “राजद फिर से बांटना चाहता है बिहार”
इस पूरे मामले को लेकर भाजपा ने राजद और तेजस्वी यादव पर सीधा निशाना साधा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता वीरेंद्र सिंह ने शुक्रवार को पटना में कहा,
“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश प्रगति की राह पर है, वहीं राजद बिहार को 2005 से पहले के अराजक दौर में ले जाना चाहता है। जिस तरह के नारे मंचों से गूंज रहे हैं, वह समाज को बांटने वाली मानसिकता का प्रतीक हैं।”
उन्होंने सवाल उठाया कि तेजस्वी यादव ऐसे नारों पर चुप क्यों हैं? क्या यह उनकी मौन सहमति है?
🟡 राजद ने नारे से किया किनारा, मगर सवाल बरकरार
राजद ने विवादित नारे से दूरी बनाते हुए सफाई दी है कि यह पार्टी की आधिकारिक लाइन नहीं है और उनकी विचारधारा इससे मेल नहीं खाती।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के नारों का उभरना RJD की छवि और उसके सवर्ण वोटबैंक को नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर तब जब पार्टी 2025 के चुनाव में सत्ता वापसी की तैयारी कर रही है।
🟢 विकास बनाम जातिवाद की जंग
भाजपा नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में कानून का राज और विकास की गति बनी हुई है, जबकि राजद जैसे दल जातिगत उन्माद भड़का कर पुराने दौर को पुनर्जीवित करना चाहते हैं।
तेजस्वी यादव से इस मुद्दे पर न केवल जवाबदेही, बल्कि जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जा रही है।
⚠️ क्या कहती है सियासी ज़मीन?
इस पूरे प्रकरण ने RJD को रक्षात्मक मोड में डाल दिया है।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि भले ही राजद ने बयान से पल्ला झाड़ लिया हो, लेकिन यह मामला आने वाले दिनों में चुनावी रणनीति और मतदाता के रुख पर सीधा असर डाल सकता है।
बिहार की सियासत एक बार फिर जातीय विमर्श और संवेदनशील नारों के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। अब देखना होगा कि तेजस्वी यादव इस नारे के सियासी असर को कैसे संभालते हैं, या फिर यह मामला RJD के लिए 2025 में भारी साबित होगा।