आजादी के 78 साल बाद भी सड़क का इंतज़ार – बिहपुर के गोपालपुर में विकास अब भी नाव के भरोसे

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बिहपुर । देश चांद पर पहुंच चुका है, स्मार्ट सिटी और एक्सप्रेस-वे की चर्चा हर मंच पर है, लेकिन बिहपुर प्रखंड के बैकठपुर दुधैला पंचायत स्थित गोपालपुर गांव के लिए आज भी “विकास” एक अधूरा वादा है। यहां करीब चार सौ परिवारों की ढाई हजार की आबादी कच्ची पगडंडियों और नाव के सहारे जिंदगी काटने को मजबूर है।

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गांव तक पहुंचने के लिए मिर्जापुर के पास स्थित मरगंगाधार को पार करना पड़ता है। पुल नहीं है—एकमात्र सहारा नाव। नाव से उतरने के बाद भी करीब दो किलोमीटर पैदल चलकर गांव पहुंचना होता है। बरसात के दिनों में यह रास्ता जानलेवा चुनौती बन जाता है। पानी बढ़ते ही संपर्क पूरी तरह टूटने की कगार पर पहुंच जाता है।

पंचायत प्रतिनिधि अरविंद मंडल, सिंकंदर मंडल और राजीव कुमार मंडल बताते हैं कि कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से पुल व संपर्क सड़क निर्माण की मांग की गई, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा। ग्रामीणों का सीधा सवाल है—“जब हर गांव को सड़क से जोड़ने का दावा होता है, तो गोपालपुर क्यों अछूता है?”

बीमार पड़ना यहां जोखिम उठाना है
गांव की अर्थव्यवस्था खेती, पशुपालन और मजदूरी पर टिकी है। सड़क नहीं होने का सबसे बड़ा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है। किसी के बीमार पड़ने पर नाव से नाथनगर ले जाना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं के लिए यह सफर पीड़ा और खतरे से भरा होता है। कई बार समय पर इलाज नहीं मिल पाने का डर परिवारों को सता देता है।

वोट के वक्त वादे, बाद में खामोशी
ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि पहुंचते हैं, वादों की झड़ी लगती है, लेकिन बुनियादी सुविधा—सड़क—आज भी सपना है। आजादी के 78 साल बाद भी यदि कोई गांव सड़क के लिए तरस रहा हो, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि विकास मॉडल पर सवाल है।

विकास की मुख्यधारा से कब जुड़ेगा गोपालपुर ?
मरगंगाधार पर पुल और मुख्य पथ से जोड़ने वाली संपर्क सड़क का निर्माण ही गोपालपुर की जीवनरेखा बन सकता है। सड़क बनेगी तो शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार और रोजगार के रास्ते खुलेंगे। वरना चांद पर पहुंचने की कहानी यहां नाव और पगडंडी के बीच ही अटकी रहेगी।
गोपालपुर के लोग अब सिर्फ वादे नहीं, जमीन पर काम देखना चाहते हैं—ताकि उनका गांव भी विकास की राह पर मजबूती से कदम बढ़ा सके।

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