भागलपुर: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भागलपुर का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। इसी जिले का बिहपुर क्षेत्र कभी क्रांतिकारियों का मजबूत गढ़ हुआ करता था। यहाँ स्थित स्वराज आश्रम और उसके प्रवेश द्वार पर बना ‘शहीद गेट’ आज भी उन नारों, संघर्षों और बलिदानों की मौन गवाही देते हैं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी।
लेकिन विडंबना यह है कि जिस धरोहर ने देश को आज़ादी की राह दिखाई, वही आज खुद बदहाली और उपेक्षा से जूझ रही है।

उपेक्षा के खिलाफ आवाज: रौशन सनगही का पहल
स्वतंत्र पत्रकार एवं ‘इंक़लाब इंडिया’ के संपादक रौशन सनगही ने इस ऐतिहासिक स्थल की दुर्दशा को लेकर बड़ा अभियान शुरू किया है। उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस धरोहर के संरक्षण की मांग की है।
उनका कहना है कि आजादी के 79वें वर्ष में प्रवेश करने के बावजूद यदि ऐसे ऐतिहासिक स्थल खंडहर बनते जा रहे हैं, तो यह पूरे राष्ट्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
6 जून 1930: इतिहास का वह दिन जिसने सब बदल दिया.
अपने आवेदन में सनगही ने 6 जून 1930 की उस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख किया है, जब नमक सत्याग्रह के दौरान अंग्रेजी पुलिस ने बिहपुर स्थित स्वराज आश्रम पर धावा बोला था।
इस दौरान निहत्थे सत्याग्रहियों पर बेरहमी से लाठीचार्ज किया गया था।
यह वही पावन धरती है जहाँ डॉ. राजेंद्र प्रसाद पर अंग्रेजों ने लाठियां बरसाईं। साथ ही खान अब्दुल गफ्फार खान के अनुयायियों और स्थानीय क्रांतिकारियों ने अपने खून से आज़ादी की कहानी लिखी।
जर्जर होती विरासत: गिरने की कगार पर ‘शहीद गेट’
वर्तमान स्थिति बेहद चिंताजनक है।
‘शहीद गेट’ अब जर्जर हो चुका है—दीवारों में उगे पेड़, दरकती संरचना और गिरती छतें प्रशासनिक उपेक्षा की साफ तस्वीर पेश करती हैं।
स्थानीय स्तर पर कई बार आवाज उठी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
सनगही ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द संरक्षण कार्य शुरू नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस ऐतिहासिक धरोहर से वंचित रह जाएंगी।
प्रधानमंत्री से चार प्रमुख मांगें
रौशन सनगही ने प्रधानमंत्री से निम्नलिखित मांगें रखी हैं.
धरोहर का दर्जा – स्वराज आश्रम और शहीद गेट को राष्ट्रीय/राज्य धरोहर घोषित किया जाए
विशेष फंड: वैज्ञानिक संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए विशेष पैकेज जारी हो
पर्यटन विकास: इसे राष्ट्रीय पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए
संग्रहालय निर्माण: परिसर में आधुनिक संग्रहालय बनाया जाए.
यह सिर्फ इमारत नहीं, राष्ट्र की आत्मा है
बिहपुर का स्वराज आश्रम केवल ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि देशभक्ति, त्याग और बलिदान की जीवित गाथा है।
रौशन सनगही की यह पहल एक स्थानीय मुद्दा भर नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक स्मृतियों को बचाने की एक राष्ट्रीय पुकार है।
अब सबकी नजरें प्रधानमंत्री कार्यालय पर टिकी हैं—क्या यह आवाज सुनी जाएगी, या इतिहास की यह अमूल्य धरोहर खामोशी में खो जाएगी ?

