“घोंसला बनाने वाले के हिस्से में तिनका”

जग नारायण मिश्र प्रतापगढ़ी
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चल भाई बंटवारा कर लें।
आधा तुम, हम आधा धर लें।

जो कुछ संपत्ति है, पुश्तैनी,
आधा घर, और आधी नशैनी,
बंटवारे की डाल दीवारें,
बांटें कमरे और मिनारें,
आधी तेरी, आधी मेरी,
बांटें दरवाजे की देहरी,
बंटवारे का शुरू जो किस्सा,
चलो करें बीघा को बिस्सा,
प्रेम बांट लें, भाव बांट लें,
दर्द बांट लें, घाव बांट लें,
राह बांट लें, चाह बांट लें,
अब तक जो परवाह, बांट लें,
बाबूजी की ,जो पूंजी खत,
तेरी मेरी अब, दूजी छत,
बहन बेटियां रिश्तेदारी,
तुझको भारी, मुझको भारी,
जो समाज और बाग बगीचे,
बाबूजी जिसको थे सींचे,
कुछ तुम खींचो कुछ हम खींचें,
जो कुछ थोड़ा कर्ज बाप का,
थोड़ा थोड़ा मेरा, आप का,
सारा दृश्य बाप मां देखें,
हैं अचेत जो रहे सरेखे,
ये सब देख गई मां सदमे,
ठिठके पांव उठे ना कदमे,
बोला बाप मेरा क्या होगा,
कहां जाएं हम, जोगा भोगा,
ये सुन बेटे सन्नाटे में,
कौन फंसे अब इस घाटे में,
बेटे धूर्त भरी साहस कर,
ये बोझा ढोऊं ना सर पर,

बोले ये, एक कमरा घर लें।
ना बोझा हम ये सर पर लें।।
चल भाई बंटवारा कर लें।
आधा तुम हम आधा घर लें।।

जग नारायण मिश्र “प्रतापगढ़ी”

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