भागलपुर। हिन्दी साहित्य के चर्चित रचनाकार, पत्रकार एवं रंगकर्मी कुमार धनंजय सुमन की नवीनतम गीतिका काव्य रचना ‘युयुत्सु’ गीता प्रेस, भागलपुर से प्रकाशित होकर पाठकों के बीच आ चुकी है। महाभारत के उपेक्षित किंतु अत्यंत संवेदनशील पात्र युयुत्सु के जीवन-संघर्ष, अंतर्द्वंद्व और नैतिक साहस को केंद्र में रखकर लिखी गई यह कृति समकालीन हिन्दी काव्य-जगत में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप मानी जा रही है।
पुस्तक का कलेवर और आवरण अत्यंत आकर्षक है, जो प्रथम दृष्टि में ही पाठक को अपनी ओर खींच लेता है। प्रकाशक द्वारा इसका मूल्य 250 रुपये निर्धारित किया गया है। कृति की विशेषता यह है कि इसमें केवल गीतिकाव्य ही नहीं, बल्कि काव्य का नाट्य रूपांतरण भी सम्मिलित किया गया है, जिससे यह रचना मंचीय प्रस्तुति की दृष्टि से भी सशक्त बन पड़ी है। साहित्य समीक्षकों का मानना है कि युयुत्सु जैसे चरित्र पर केंद्रित यह संभवतः हिन्दी में अपने ढंग का पहला गंभीर काव्य-प्रयास है।
लेखक ने युयुत्सु के माध्यम से सत्ता, सत्य और नैतिकता के उस द्वंद्व को उकेरा है, जो आज के समाज में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना महाभारत काल में था। काव्य में करुणा, विद्रोह, आत्मसंघर्ष और मानवीय गरिमा के अनेक रंग दिखाई देते हैं। सरल किन्तु प्रभावशाली भाषा, गीतात्मक प्रवाह और गहरी दार्शनिक दृष्टि इस कृति को विशिष्ट बनाती है।
कुमार धनंजय सुमन हिन्दी साहित्य में पहले से ही एक स्थापित नाम हैं। पत्रकारिता, रंगमंच और साहित्य—तीनों क्षेत्रों में सक्रिय सुमन की लेखनी सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं से गहरे जुड़ी रही है। इससे पूर्व उनकी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित होकर पाठकों और आलोचकों का ध्यान आकर्षित कर चुकी हैं।
उनका उपन्यास ‘हाफलेट’, रिपोर्ताज संग्रह ‘दियरा डायरी’, कहानी संग्रह ‘मैं और मेरा एकांत’ तथा ‘आधी जिंदगी’, काव्य संग्रह ‘कारण खुद से पूछ रहा है’, एवं शोधपरक कृति ‘महात्मा गांधी और मानवता’ साहित्य जगत में पर्याप्त चर्चित रही हैं। इन कृतियों ने उन्हें एक बहुआयामी रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
‘युयुत्सु’ के संदर्भ में लेखक का कहना है कि महाभारत के विराट आख्यान में कई ऐसे पात्र हैं, जिनकी पीड़ा और संघर्ष पर अपेक्षित चर्चा नहीं हुई। युयुत्सु उन्हीं में से एक है—जो अन्याय के पक्ष में जन्म लेकर भी सत्य के साथ खड़ा होता है। यह कृति उसी नैतिक साहस की काव्यात्मक खोज है।
भागलपुर के साहित्यिक समाज में इस पुस्तक के प्रकाशन को लेकर उत्साह का माहौल है। नगर के अनेक साहित्यकारों ने इसे हिन्दी काव्य परंपरा में एक सार्थक और मौलिक प्रयास बताया है। शीघ्र ही शहर में पुस्तक के लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है, जिसमें साहित्य, रंगमंच और पत्रकारिता जगत की प्रमुख हस्तियाँ शामिल होंगी।
गीता प्रेस के प्रतिनिधि के अनुसार पुस्तक देशभर के प्रमुख पुस्तक विक्रेताओं के साथ-साथ ऑनलाइन माध्यमों पर भी उपलब्ध कराई जाएगी। पाठकों को उम्मीद है कि ‘युयुत्सु’ न केवल महाभारत के एक भूले-बिसरे पात्र को नई पहचान देगी, बल्कि समकालीन मनुष्य के नैतिक प्रश्नों से भी संवाद स्थापित करेगी।
साहित्य प्रेमियों का मानना है कि कुमार धनंजय सुमन की यह कृति उनके रचनात्मक सफर में एक नया अध्याय जोड़ेगी और हिन्दी पाठकों के लिए एक यादगार काव्यानुभूति सिद्ध होगी।

