बिहार में मातृ एनीमिया पर बड़ा फोकस, गंभीर मामलों में मुफ्त IV आयरन उपचार की सुविधा

पटना: गर्भावस्था के दौरान एनीमिया यानी खून की कमी मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। मातृ एनीमिया की समय पर पहचान, सही उपचार और नियमित फॉलो-अप को लेकर पटना में ग्लोबल हेल्थ स्ट्रेटजीज संस्था की ओर से मीडिया कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में विशेषज्ञों ने मातृ एनीमिया के प्रति जागरूकता बढ़ाने और गर्भवती महिलाओं तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने में मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
बिहार में गर्भवती महिलाओं में बढ़ा एनीमिया का बोझ
राधा देवी जागेश्वरी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, मुजफ्फरपुर की प्रिंसिपल प्रो. (डॉ.) आभा रानी सिन्हा ने बताया कि बिहार में मातृ एनीमिया अभी भी गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती है। उनके अनुसार, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 से राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के बीच बिहार में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की व्यापकता 58.3 प्रतिशत से बढ़कर 63.1 प्रतिशत हो गई।
वहीं प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं में एनीमिया का आंकड़ा 60.3 प्रतिशत से बढ़कर 63.5 प्रतिशत पहुंच गया। विशेषज्ञों के अनुसार ये आंकड़े एनीमिया की समय पर जांच और उपचार की जरूरत को रेखांकित करते हैं।
गंभीर एनीमिया में मुफ्त फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज उपचार
डॉ. आभा रानी सिन्हा ने बताया कि एनीमिया मुक्त भारत अभियान 2.0 के तहत रोकथाम के साथ-साथ एनीमिया की पहचान और मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार पर जोर दिया जा रहा है।
गंभीर एनीमिया से पीड़ित गर्भवती महिलाओं के लिए चिन्हित स्वास्थ्य केंद्रों पर इंट्रावेनस फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज़ (IV Ferric Carboxymaltose) का इंजेक्शन मुफ्त उपलब्ध कराया जा रहा है। बिहार में मार्च 2026 से इस उपचार को पूरे राज्य में लागू किए जाने की जानकारी दी गई। इसके तहत करीब 2 लाख खुराक उपलब्ध कराई गई हैं।
उन्होंने बताया कि दिसंबर 2025 में फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज़ को बिहार की आवश्यक औषधियों की सूची में शामिल किया गया, जिससे जिला और प्रखंड स्तर की स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से गंभीर एनीमिया से पीड़ित महिलाओं तक उपचार पहुंचाने में मदद मिलेगी।
‘टेस्ट, ट्रीटमेंट, टॉक और ट्रैक’ पर जोर
कार्यशाला में बताया गया कि एनीमिया नियंत्रण की रणनीति में पहले की 6×6×6 रणनीति को विस्तारित करते हुए 7×7×7 रूपरेखा तथा चार ‘टी’—टेस्ट, ट्रीटमेंट, टॉक और ट्रैक—पर जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों ने कहा कि केवल एनीमिया की पहचान करना पर्याप्त नहीं है। उपचार शुरू होने के बाद महिला की स्थिति की नियमित निगरानी और आवश्यकता के अनुसार उपचार में बदलाव भी जरूरी है।
एक खुराक से आयरन की कमी पूरी करने में मदद
मेदान्ता, पटना की निदेशक एवं प्रसूति एवं स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ. मीना सामंत ने बताया कि इंट्रावेनस फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज़ के माध्यम से एक बार में शरीर को आवश्यक आयरन की बड़ी मात्रा दी जा सकती है। इससे बार-बार अस्पताल आने की जरूरत कम हो सकती है।
उन्होंने गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और उपचार के बाद फॉलो-अप पर जोर दिया। उनके अनुसार भारत और विदेशों में हुए अध्ययनों में गर्भावस्था के दौरान इंट्रावेनस आयरन को प्रभावी और सुरक्षित पाया गया है।
मातृ एनीमिया के खिलाफ मीडिया की अहम भूमिका
ग्लोबल हेल्थ स्ट्रेटजीज के सीनियर डायरेक्टर अनुज घोष ने कहा कि मातृ एनीमिया के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। समाचारपत्रों और टीवी चैनलों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों तक सरल एवं सही स्वास्थ्य संदेश पहुंचाए जा सकते हैं।
उन्होंने मीडिया से अपील की कि महिलाओं को नियमित स्वास्थ्य जांच कराने, चिकित्सकीय सलाह के अनुसार आयरन एवं अन्य जरूरी उपचार लेने और उपचार बीच में नहीं छोड़ने के लिए जागरूक किया जाए। साथ ही एनीमिया को लेकर समाज में मौजूद मिथकों और भ्रांतियों को दूर करने की दिशा में भी मीडिया सक्रिय भूमिका निभाए।



