साहित्यकविता कानन
चन्द्र रवि वार कर दो

चन्द्रहास लेकर करो में,
चन्द्र रवि वार करदो,
श्रृष्टि का घनघोर अंधेरा,
प्रकाश मय इकबार करदो,
हर्ष औ उल्लास नेत्र से,
सर्वदा सर्वत्र लुप्त हो गये हैं,
वैरी के मनोभावों को,
विकराल विकट हो प्रकट नष्ट,
वैरी का तुम बार बार,
चन्द्र रवि हर वार करदो।


