आत्ममंथन की घड़ी में भाजपा – क्या कोर वोटर की आवाज़ सुनी जाएगी ?

न्यूज डेस्क : राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी ताकत केवल उनका नेतृत्व नहीं, बल्कि वह कार्यकर्ता होता है जो बिना किसी पद और स्वार्थ के वर्षों तक संगठन का झंडा उठाए रहता है। चुनाव जीतने वाले चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन विचारधारा और संगठन की असली नींव बूथ स्तर का कार्यकर्ता ही होता है। इसलिए जब वही कार्यकर्ता सवाल पूछने लगे, तो किसी भी दल के लिए यह आत्ममंथन का समय होता है।
इन दिनों भाजपा के पारंपरिक समर्थक वर्ग में कुछ घटनाओं और विवादों को लेकर असहजता की चर्चा है। भरत तिवारी प्रकरण, छात्रों पर AK-47 जैसे हथियारों के इस्तेमाल से जुड़े आरोपों और विवादों की चर्चा, तथा सोशल मीडिया पर सवर्ण समाज और मुख्यमंत्री की जातिगत पहचान को लेकर इस्तेमाल की जा रही आपत्तिजनक भाषा—इन सबने समर्थकों के बीच अनेक प्रश्न खड़े किए हैं। इन मामलों में अंतिम सत्य का निर्धारण संबंधित संस्थाओं और न्यायिक प्रक्रियाओं का विषय है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से उठ रहे सवालों को अनदेखा करना भी आसान नहीं है।
भाजपा को स्वयं से पूछना होगा कि उसकी राजनीति की दिशा क्या है ? क्या चुनावी रणनीति बनाते समय उस कार्यकर्ता की भावनाओं को भी उतना ही महत्व दिया जा रहा है, जिसने कठिन समय में पार्टी का साथ नहीं छोड़ा ? क्या केवल चुनावी अंकगणित के आधार पर ऐसे निर्णय लिए जा सकते हैं, जिनसे संगठन के पुराने समर्थक स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगें ?
आज की राजनीति 1990 के दशक वाली राजनीति नहीं है। सोशल मीडिया ने हर कार्यकर्ता और मतदाता को अपनी बात रखने का मंच दे दिया है। विशेषकर युवा मतदाता किसी भी निर्णय को बिना सवाल किए स्वीकार नहीं करता। वह तर्क चाहता है, संवाद चाहता है और नेतृत्व से स्पष्टता की अपेक्षा रखता है। ऐसे समय में संवाद का अभाव अक्सर असंतोष को जन्म देता है।
एक और प्रश्न राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है। यदि किसी नेतृत्व या निर्णय को लेकर लगातार सार्वजनिक बहस और विवाद रहे हैं, तो क्या पार्टी ने उसके सभी राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों का पर्याप्त आकलन किया ? यदि संगठन के भीतर इस पर विचार हुआ, तो क्या उसके निष्कर्ष कार्यकर्ताओं तक पहुँचे ? लोकतांत्रिक दलों की ताकत केवल निर्णय लेने में नहीं, बल्कि उन निर्णयों को अपने कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्य बनाने में भी होती है।
राजनीति का इतिहास बताता है कि चुनाव केवल जातीय समीकरणों से नहीं जीते जाते। समाज का विश्वास, कार्यकर्ताओं का मनोबल, नेतृत्व की विश्वसनीयता और सभी वर्गों के बीच संतुलन—यही किसी दल की वास्तविक पूंजी होती है। यदि इन आधारों में दरार आने लगे, तो उसका असर देर-सवेर चुनावी राजनीति पर भी दिखाई देता है।
भाजपा का मूल मंत्र रहा है—”सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास।” यह नारा तभी सार्थक माना जाएगा, जब पार्टी का प्रत्येक समर्थक यह महसूस करे कि उसकी भावनाओं, सम्मान और विश्वास का भी उतना ही मूल्य है, जितना किसी नए राजनीतिक समीकरण का।
यह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ अभियान नहीं है और न ही किसी समुदाय के पक्ष या विपक्ष का प्रश्न। यह उस संगठनात्मक संस्कृति पर विचार करने का आग्रह है, जिसने भाजपा को दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनाया।
क्योंकि अंततः चुनावी जीत से भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भाजपा अपने उस कार्यकर्ता का विश्वास बनाए रख पाएगी, जिसने सत्ता नहीं, बल्कि विचार के लिए पार्टी का साथ चुना था?
राजनीति में हार की भरपाई अगले चुनाव में हो सकती है, लेकिन यदि कार्यकर्ता का विश्वास टूट जाए, तो उसकी भरपाई वर्षों में भी आसान नहीं होती। इसलिए यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है—और शायद यही किसी भी बड़े राजनीतिक दल की सबसे बड़ी ताकत भी होती है।



